Calculate Street Light Pole’s Distance / Fixture Watt / Lighting Area

Electrical Notes & Articles

(1) Calculate Distance between each Street Light Pole:

Example: Calculate Distance between each streetlight pole having following Details,

  • Road Details: The width of road (w) is 11.5 Foot.
  • Pole Details: The height of Pole is 26.5 Foot.
  • Luminaire of each Pole: Wattage of Luminaries is 250 Watt, Lamp Out Put (LL) is 33200 Lumen, Required Lux Level (Eh) is 5 Lux, Coefficient of Utilization Factor (Cu) is 0.18, Lamp Lumen Depreciation Factor (LLD) is 0.8, Lamp Lumen Depreciation Factor (LLD) is 0.9.
  • Space Height Ratio should be less than 3.

Calculation:

  • Spacing between each Pole=(LL*CU*LLD*LDD) / Eh*W
  • Spacing between each Pole=(33200×0.18×0.8×0.9) / (5×11.5)
  • Spacing between each Pole= 75 Foot.
  • Space Height Ratio = Distance between Pole / Road width
  • Space Height Ratio = 3. Which is less than define value.
  • Spacing between each Pole is 75 Foot.

(2) Calculate Street Light Luminaire Watt:

Example: Calculate Streetlight Watt of each Luminaire of Street Light…

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प्रिय तुम मुझ बिन

“चर्चित हिन्दी रत्न” हैं… आज नहीं तो कल होंगे…!
बादलों की ओट में सितारे सदा तो नहीं रहेंगे!

ज्योति कलश

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,

मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

छोड़ो भी अब झगड़ा रगड़ा ,

अब यह सब मैं सह न सकूंगी |

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काठमांडू कॉलिंग

माननीय माला जोशी शर्मा जी की एक और महत्वपूर्ण रचना (संस्मरण ््)

स्पंदन

एक समय ऐसा आता है कि आप सबकी खुशी और सबके मन की सोचते-सोचते अपने मन की सुनना और समझना भूल जाते हो । कभी वो बोलता भी है तो उसे हँस कर पागल समझने लगते हैं । कभी अंजानी गहरी उदासी घेर कर उसे इतना डुबो देती है कि हाथ-पाँव मार कर वो साँस लेने ऊपर आना चाहता है ।
मेरा भी मन हाथ-पाँव मार रहा था , साँस लेना चाहता था । बचपन की यादें रह-रह के एक टीस उठातीं । पता था कि वो बहुत पीछे छूट गया था फिर भी वो धुंधले चेहरे आँखों के पानी में तैरते रहते थे । हॉस्टल में हर पल साथ रहने वाले , खेलने वाले वो साथी एक हवा के झोंके से बुझे दीए की तरह एक दिन अचानक छूट गए । उनके अचानक छूटने का दर्द भीतर ही भीतर पल रहा था ये एहसास भी कभी सिर नही उठाता…

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मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

 मेरे सुझावों/ संदेशों को अव्यवहारिक मान सकते हैं ..

इसीलिये यह अग्रिम स्पष्टीकरण देना अपना कर्त्तव्य समझ प्रस्तुत कर रहा हूँ } –

साथ ही एक निवेदन भी कि –

“उपदेशक के व्यक्तित्व से अधिक सन्देश की उपयोगिता को महत्त्व देना चाहिए ”
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –
पर उपदेश कुशल बहुतेरे …
हममें से अधिकांश
किसी उपदेश की प्रतिक्रिया में
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखित
उक्त पंक्तियाँ दोहरकर
उपदेशक पर अव्यावहारिक होने का दोष मढ़ते रहते हैं .
मजेदार बात यह है कि
आधी चौपाई ही प्रचलित है
पूरी चौपाई कम ही लोगों को याद आ पाती है –

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर ना घनेरे ”
पूरी चौपाई मालूम भी हो जाए तो
यही समझा जाता है कि
खुद अपने उपदेशों पर आचरण करने वाले कोई नहीं होते !
किन्तु ऐसा समझना कितना ठीक है ?
सन्देश तो यह है कि 

“दूसरों को उपदेश देना तब ही ठीक है जब उनका अनुपालन उपदेशक स्वयं करता हो!”

आमजन सोचता है  हम आम हैं , खास नहीं !
और हमें खास होने की आवश्यकता ही क्या है ?
आप अपने आदर्शों का पालन करने स्वतंत्र हैं 

किन्तु मुझे आदर्श आचरण करने की क्या आवश्यकता है !

आज का उपदेशक स्वयं को विशिष्ट मानकर

सामान्य जन से अनुपालन की अपेक्षा में उपदेश देता है

और आमजन स्वयं को किसी आदर्श के अनुपालन का अधिकारी ही नहीं मानता !

इसीलिये जानने वालों की, लिखाने वालों की संख्या तो

दिनों दिन बढ़ रही है !

मगर मानने वाले ढूढ़़ना कठिन हो गया है!

जबकि मेरे किसी भी ब्लॉग पर कहीं भी लिखा गया

कोई भी व्यक्तिगत या सामाजिक सुझाव
ऐसा नहीं है जिसका अनुपालन मैं स्वयं नहीं करता !


कारण मेरे कुल के आदर्शवादी संस्कार होंगे शायद !

निश्चय ही आसान नहीं होता कि
जिन आदर्शों का हम समर्थन करें
उन्हें अपनाएँ भी
किन्तु
सरल तो कुछ भी नहीं!
जो जितना कठिन कार्य होगा
उसका प्रतिफल भी उतना ही सुखकर होगा !

मेरी जीवनचर्या के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ .
इस उद्देश्य के साथ कि मेरे जैसा “आम आदमी” भी ऐसा है .
तो हर कोई हो सकता है !

मैं मेरे देश से प्रेम करता हूँ इसीलिये
क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता का खुलकर विरोध करता हूँ !

.

{मेरे लिए भारत देश मेरा बहुत बड़ा मकान है जिसमें
मेरा निवास भी है, कार्यालय भी, बगिया भी ,खेती – बाड़ी भी
केरल,कर्नाटक , तमिलनाडु, आन्ध्र और महाराष्ट्र, गुजरीत मुख्यद्वार से लगे कार्यालय एवं बैठक हैं,
दक्षिणी प्रदेश में लान, बाग़, बगीचे और जलनिधि हैं ,
पूर्वोत्तर पिछवाड़े का कछवारा है,
पंजाब, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड आदि मेहमानखाने { गेस्टरूम }
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान , बिहार आदि प्रदेश
शयन कक्ष ,भोजन कक्ष ,रसोई आदि जरुरी हिस्से हैं .}
.

जितने उपलब्ध हो सके विभिन्न धर्म के ग्रंथों को पढ़ने / समझने का प्रयास किया
किसी भी भारतीय {हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई , बौद्ध, जैन आदि } धर्म में
एक भी असंगत बात नहीं मिली सभी में उचित आदर्शों के पालन के सन्देश मात्र
किसी धर्मं में एक भी शब्द मानवता विरोधी नहीं मिला .
.
इसीलिये सभी धर्मों का सामान रूप से आदर करता हूँ
.

मेरा परिवार

– जातपात पूछकर किसी से किसी तरह का व्यवहार नहीं करता !
– ना ही जाति के आधार पर व्यवहार परिवर्तन !
– दीपावली पर दीपमालिका तो सजाता है मगर
पटाखों पर खर्च करने के स्थान पर अनाथालयों , वृद्धाश्रमों में सामर्थ्यानुसार फल आदि पंहुचाता है !
– भिखारी को नकद भीख ना देकर भोजन सामग्री ही देता है !
– किसी भी धार्मिक समारोह {गणेशोत्सव , दुर्गोत्सव जैसे } में चंदा नहीं देता किन्तु
श्रद्धानुसार / सामर्थ्यानुसार पूजन /हवन /प्रसाद सामग्री का योगदान करता है !
– होलिकोत्सव पर कोई भी रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं करता !
– रेलवे स्टेशन आदि सार्वजानिक जगहों पर कचरा पेटी थोड़ी दूर पर भी हो तो भी प्रयोग करने पूरा प्रयत्न करता है !
– देवी देवताओं की तस्वीरों सहित पैकिंग वाले उत्पाद ,अगरबत्ती/ धूपबत्ती आदि पूजन सामग्री भी, खरीदने से बचता है !
– आर्थिक असमर्थता के वर्ष छोड़कर प्रतिवर्ष किसी योग्य निर्धन छात्र /छात्रा को शिक्षा सामग्री, फीस आदि की सहायता करता है !
– परनिंदा रस परिचर्चा में योगदान नहीं करता !
-अपनों की प्रगति में अपनी प्रगति सा प्रसन्न होता है !

-विरोधियों की प्रगति से आहत नहीं !
– केवल कार्यों का विरोध करता है व्यक्तियों का नहीं !
– हमारा कोई दुश्मन नहीं !
– किसी अन्य के ज्ञात गुप्त प्रकरणों / शर्मिंदगी के कारकों का प्रचार प्रसार नहीं करता !
– पानी के दुरूपयोग को निरुत्साहित करने प्रयासरत रहता है !
– बेटा – बेटी – बहु की समानता का समर्थक है !
(मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर बेटी नहीं जन्मीं तब किसी अनाथ को गोद लेने का २० वर्षों तक असफल प्रयास किया
अनाथालयों ने या तो एक संतान के होते हुए दूसरी को गोद ना दे पाने की कानूनी मजबूरी कह टाल दिया या
बड़ी राशी के योगदान की शर्त रखी. मैं दोनों तरह से अयोग्य था. अब बच्ची की जिम्मेदारियां पूरी कर सकने योग्य
उम्र शेष नहीं लगती . इसीलिये इस कमी के साथ रहने की आदत डाल ली है .
हाँ बेटे और सजातीय/ विजातीय बहु दोनों हमारे लिए एक समान मान्य हैं)
.

कैसे किया ? क्या खोया ? क्या पाया ?

.

एक दिन में नहीं हुआ सबकुछ .
मैं शुरुआत से ऐसा ही नहीं हूँ
मैंने भी अपरिपक्वता की आयु में पिताजी से असहमति जताई है .
मैं भी पिताजी के आदर्शवादिता वश आर्थिक अभावों से आक्रोशित रहा हूँ
किन्तु समय के साथ साथ पुस्तकों और परिचर्चाओं से परिपक्वता बढ़ती जा रही है,
और ईमानदारी से परिपूर्ण आदर्शों भरा जीवन जीने का वास्तविक सुख उठाकर
मेरे साथ साथ मेरी पत्नी, मान्य बेटियाँ और बेटे भी गौरवान्वित हैं !
मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे आदर्शों के पालन में
मेरी पत्नी और बेटों के साथ साथ नवसम्मिलित बेटियों का भी समर्थन और सहयोग प्राप्त है .

पत्नी वैवाहिक जीवन कि प्रत्येक वर्षगाँठ के साथ साथ और अधिक अनुसारी होते होते
२३ वे वैवाहिक वर्ष तक आदर्शवादिता में मुझसे आगे निकल चुकी हैं .
यही हाल बेटों का है .

जैसे मैंने मेरे पिताजी के सिद्धांतों को पाला
मेरे बेटे मुझसे अधिक अच्छी तरह
मुझसे अपेक्षाकृत बहुत कम आयु में
उन्हीं आदर्शों को प्रसारित कर रहे हैं .

क्या खोया ? क्या पाया ?

-मेरे स्कूल में दाखिले के समय मैं बहुत शर्मीला था
जैसे तैसे पहली कक्षा में दाखिला हुआ
छोटे से गाँव के छोटे से सरकारी प्राइमरी स्कूल में .
वहां के हेड मास्टर भी सिद्धांतवादी ही थे
साल भर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद
परीक्षा में जाने क्या हुआ था मुझे
मास्साब के बार बार कहने पर भी कि “कहानी सुनाओ नहीं तो फेल हो जाओगे ”
मैंने कहानी नहीं सुनाई तो नहीं सुनाई ,
और मैं फेल हो गया
पिताजी के साथियों ने बहुत कहा
“बड़े बाबू आप जाकर मिल लो,

मास्साब आपकी बात रखेंगे,

बच्चे का साल बच जाएगा ”
मगर पिताजी को पढ़ाई में पक्षपात पूर्ण परिणाम पसंद नहीं था
अगले ही वर्ष से मुझे स्वयं भी घर पर पढ़ाई में मदद करने लगे
और तब से ही हर साल हर कक्षा में मेरा परीक्षा परिणाम सर्वप्रथम रहने लगा था .
मैंने एक साल खोया था किन्तु जो पाया वह तो वर्णनातीत है …

– मेरे विवाह के बाद पत्नी से पहले संवाद में
पत्नी ने पूछा “मुझसे कितना प्यार करते हो ?”
मेरा उत्तर था

“हम आज पहली बार मिल रहे हैं… अभी तो एक दुसरे को ठीक तरह देखा भी नहीं…
अभी तो प्यार का जन्मना भी शेष है ”

उन्हें अच्छा नहीं लगा  “क्या यह काफी नहीं कि हम पतिपत्नी हैं ? ”

मैंने समझाने का प्रयास किया “हम पति पत्नी हैं यह हमारा रिश्ता है

किन्तु किसी भी रिश्ते में प्यार का पल्लवन एक दूसरे के प्रति किये जाने वाले व्यवहार से होता है ,

आप मेरी पत्नी हैं जिस तरह मैं आपसे और आप मुझसे व्यवहार करेंगी उसी तरह प्रेम बढ़ेगा ”
उन्हें इस बात पर मुझसे सहमत होने में २० वर्ष लग गए किन्तु
आज हम दोनों मिलकर ही पूर्ण हैं , एक दूसरे के बिना, दोनों ही आधे हैं .
वो एक विदुषी महिला हैं किन्तु मेरी और उनकी विचारधारा ठीक विपरीत थी
दोनों ही अपूर्ण , दोनों ही दोष सहित किन्तु
दोनों के विचारों के मेल से एक नयी विचारधारा का जन्म हुआ

और आज दोनों मिलकर एक सशक्त दंपत्ति !
-जब जिसके लिए जो कर सकते थे
हम करते रहे
परिणामतः हमारे नाम किसी बैंक में कोई फिक्स डिपाजिट नहीं ,
कोई और नगद निवेश भी नहीं !
किन्तु इस रास्ते पर चलते ,

हममें से हर एक के पास, अपने-अपने सम्पर्कों के, अपनेपन की अनेकीनेक फिक्स डिपाजिट हैं.
इनका पता तब चला जब विगत २ वर्ष (
2008-09) अस्वस्थता वश अवैतनिक अवकाश पर रहा !
मैं मेरे माता पिता का एकमात्र पुत्र और ३ बहनों का अकेला भाई ‘ था ‘
किन्तु आज मेरे कम से कम ५० ‘सगे भाई’ तो होंगे ही !
इतनी ही बहनें और बेटियां भी !
भले मैं धन संपन्न नहीं ,
किन्तु सुखी-समृद्ध अवश्य हूँ !
मुझ सी समृद्धि धन से नहीं मिलती !
धन की चाह
“साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ , साधू ना भूखा जाय ”
जितनी ही है!
यानी प्रभु इतना अवश्य दे देते हैं जिसमें
कुटुंब की आज के समय की आवश्यकताओं की पूर्ती हो जाती है.
और कितना चाहिए ?
क्योंकि
“पूत सपूत तो क्यों धन संचय
पूत कपूत तो क्यों धन संचय”
अति प्रासंगिक है .
मैं और मेरे परिजन
स्वयं को समृद्ध ही मानते हैं !
जिस तरह मैं स्वयं सुखी हो पाया हूँ ,
जिस मार्ग पर चलकर हो पाया हूँ
केवल वही अनुभूत उपदेश / सलाहें / सन्देश
मेरे लेखों के माध्यम से देने संकल्पित हूँ !
जिन्हें भी अन्यथा प्रतीत हो उनके लिए यह लेख लिखा है
फिर भी प्रश्न शेष हों तो प्रतिक्रिया खंड में स्वागत है .
मेरा स्पष्टीकरण या क्षमा याचना अवश्य वहां मिलेगी !